घंटो टीवी मोबाइल देखने से हो सकता है कैंसर - ऐसे बचे

घंटो टीवी मोबाइल देखने से हो सकता है कैंसर – ऐसे बचे

घंटो टीवी मोबाइल देखने से हो सकता है कैंसर :-बिं ज वॉचिंग यानी लगातार स्क्रीन के सामने बैठकर टीवी या स्मार्टफोन में मूवीज अथवा वेब सीरीज देखना। पिछले कुछ सालों से बिंज वॉचिंग की आदत तेजी से बढ़ी है, खासकर आजकल रात के समय घंटों वेब सीरीज देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। लेकिन यह आदत कैंसर जैसी बीमारी का कारण भी बन सकती है।

कैंसर पर कार्य करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार स्क्रीन के सामने बैठे रहने से इंसान की इम्युनिटी कम हो जाती है। दरअसल, सभी लोगों के शरीर में अवनॉर्मल सेल्स तो होते हैं, लेकिन शरीर की इम्युनिटी उन्हें कैंसर में बदलने नहीं देती। लेकिन जब इम्युनिटी ही कम होगी, तब उन सेल्स का कैंसर में बदल जाने की आशंका भी बढ़ेगी।

कुछ रिपोट्स बिंज वॉचिंग के खतरे के प्रति आगाह करती हैं। इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर नामक रिपोर्ट में कहा गया कि जो पुरुष दिन में चार घंटे से अधिक टीवी देखते हैं, उनमें कोलोरेक्टल कैंसर होने का खतरा उन लोगों की तुलना में 35% अधिक है, जो एक घंटे या कम टीवी देखते हैं। इसी तरह ग्लासगो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 3.90 लाख उन लोगों का विश्लेषण किया था, जो स्क्रीन के सामने ज्यादा समय बिता रहे थे। शोध में ज्यादा स्क्रीन टाइम वाले लोगों में हार्ट डिजीज व कैंसर जैसी बीमारी का खतरा अधिक पाया गया था।

अमेरिकन जर्नल मेडिसिन एंड साइंस इन स्पोर्ट्स एंड एक्सरसाइज के अनुसार हर दिन करीब 45 मिनट यानी हफ्ते में पांच घंटे कसरत करने से कैंसर के जोखिम को कम किया जा सकता है। शोध में पाया गया कि अधिक शारीरिक रूप से सक्रिय लोगों में पेट, गर्भाशय, ब्रेस्ट और कोलन कैंसर की आशंका कम होती है, विशेष रूप से उन लोगों में जो प्रति सप्ताह कम से कम 300 मिनट एक्सरसाइज करते हैं। सिर्फ इस एक काम से कैंसर के 3 फीसदी मामले कम किए जा सकते हैं। यानी हमारे देश में 46 हजार मरीजों को कैंसर के जोखिम से बचाया जा सकता है। गौरतलब है कि भारत में हर साल कैंसर के लगभग 15 लाख मामले आते हैं।

अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के अनुसार हर 4 में से 1 कैंसर मरीज डिप्रेशन का शिकार होता है। ऐसे में कुछ थेरेपीज के इस्तेमाल से डिप्रेशन और एंग्जाइटी को कम किया जा सकता है…

लाइफ एक्सपेक्टेंसी बेहतर करने के लिए टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में मेट्रोनॉमिक थेरेपी की शुरुआत की गई है। यह एक तरह से ओरल कीमोथेरेपी है। सस्ती है और टॉक्सीसिटी भी कम है। इसकी मदद से मरीज ट्यूमर के साथ लंबे समय तक जीवन बिता
सकता है।

कैंसर मरीजों के साथ एक म्यूजिक थेरेपिस्ट बैठकर संगीत के माध्यम से मदद करता है। इसमें संगीत सुनना, गुनगुनाना और म्यूजिक प्लेलिस्ट बनाने जैसी एक्टिविटीज शामिल हैं। कई बार मरीजों को छोटे-छोटे टास्क दिए जाते हैं, जैसे किसी धुन पर नया गाना लिखना या गाना सुनाना।

दैनिक जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी गलतियां या लापरवाही भी कैंसर को न्यौता दे सकती हैं। यानी अगर इन लापरवाहियों पर ध्यान दें तो कैंसर की आशंका को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

अधिकांश रूम फ्रेशनर्स में फार्मल्डिहाइड अथवा नेप्थलीन जैसे तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है। ये रूम फ्रेशनर हवा में कैंसर पैदा करने वाले केमिकल रिलीज करते हैं। इसलिए इनका इस्तेमाल यथासंभव कम से कम करना चाहिए। लेकिन फिर भी अगर आप कभी- कभार इनका इस्तेमाल करना चाहते हैं तो ध्यान दें कि कमरे में थोड़ी-थोड़ी बाहर की हवा जरूर आने दें।

कई शोध संकेत करते हैं कि वे फूड जिनमें प्रीजर्वेटिव्स का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है, कैंसर की वजह बन सकते हैं। इसलिए प्रीजर्वेटिव्स वाले फूड आइटम्स जैसे सॉसेस, जैम, चिप्स आदि को ज्यादा खाना अवॉइड करें। पिज्जा, बर्गर जैसे कई तरह के फास्ट फूड में भी इनका उपयोग होता है। इसलिए अगर इन्हें खाना ही है तो स्वयं घर पर बनाएं और खाएं।

प्लास्टिक में पोलिविनाइल क्लोराइड पोलिस्टिरीन जैसे कई हानिकारक तत्व होते हैं। जब ये तत्व किसी गर्म चीज के संपर्क में आते हैं तो उनके द्वारा रिलीज केमिकल्स उस खाने या पीने की सामग्री में मिल जाते हैं। कुछ अध्ययनों के अनुसार इन केमिकल्स का ज्यादा उपभोग होने पर ये किडनी या गले के कैंसर की वजह बन सकते हैं। चाय के डिस्पोजेबल कप भी घातक हो सकते हैं।

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित रिसर्च और कुछ अन्य शोध-पत्रों के अनुसार बार-बार गर्म किए गए तेल में फ्राई की गई चीजों को खाने से ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। तेल को बार-बार गर्म करने से उसमें रिएक्टिव टॉक्सिक उत्पन्न होने लगते हैं, इसलिए डाइट में ऐसे तेल का ज्यादा इस्तेमाल कैंसर की आशंका को बढ़ा सकता है।

कैंसर होने के पीछे कई कारक जिम्मेदार होते हैं। कुछ तो हमारे वश में नहीं होते। लेकिन जो हमारे नियंत्रण में हैं, उन पर ध्यान देकर हम इस बीमारी की आशंका को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

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